सवाल।

कुछ सवाल बहूत बवाल यें कैसा मंज़र हैं? इजाज़त लेनी पड़े जगह बनानी पड़े, यें कैसा एतबार हैं? मुसाफ़िर गुमसुम रहे क़ातिल शोर करें, यें कैसा नज़रिया हैं? धुन कोयल की हो नाम बम-धमाके करें, यें कैसी हिदायत हैं? इंसान खुदा की दसताकरी हों खुदाई इंसान करें, यें कैसा रवैया हैं? सब सवाल सब बवाल…

बदलते मौसम।

इस मौसम का मिजाज़ तो देखो होश में भी नशे से चूर है उन ऑंधी से हारे पत्तो को देखो भगवे रंग में भी शायर सा नूर हैं। मैं नाप सकूं अगर समुद्र सारे मैं भाप सकूं अगर पतझड़ सारे फिर मैं बोलू खुद को, यह कैसा फितूर हैं ? इस मौसम का मिजाज़ तो…

~ हमारे चाँद पर घाव हैं ~

कैसे रूठा बैठा है हमारा चाँद उन हरी बर्फ़ीली वादियों में, लगता है कोई घाव है जो फिरन नीचे छिपाया है । मैं रहता हू ऐसे गुल में जिसके गुलशन में सिर्फ़ काँटे है तुम बात करते हो तीन सौ सत्तर की घाव अधूरे जिसने बाँटे है । सुरेश को क्या पता वो अहमद नहीं…

सिर्फ़ मैं जानती हूँ ।

कितनी अनोखी हूँ मैं सिर्फ़ मैं जानती हूँ किस दौर से गुज़री हूँ सिर्फ़ मैं जानती हूँ । मेरी आँखों ने सिर्फ़ झुकना सीखा है मेरे जज़्बातों ने सिर्फ़ दबना सीखा है कितनी घुटन होती है जब बात लबों से टकरा, वापस लौट जाती है सिर्फ़ मैं जानती हूँ। तुम बातें तो बहुत करते हो…

आज कल ।

अब मैं इन शामों को कवितायें नहीं लिखा करता क्योंकि शायद आज कल कमरे से बाहर कम निकलता हू उस ढलते हुए सूरज को कम देखता हू। आज कल नींद उतनी अच्छी नहीं आती उठ जाऊँ तो माँ की याद आती है की कहा है वो आँचल उनका जहाँ अपना दुःख बेचता हू आज कल…